धर्म न तो अवैज्ञानिक है और न अनुपयोगी

विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं

मैं और मेरा नहीं, हम और हमारा

विद्या ही तो सफलता का मूल आधार है

पुरुषार्थी ही पुरस्कारों के अधिकारी

धर्म रहित विज्ञान सर्वनाश करके छोडेगा :

कया हमारे लिए येही उचित है ?

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